- अलखनंदा का पानी भी गंगाजल की तरह कभी खराब नहीं होता, इसलिए यहां भी हो रहा अस्थि विसर्जन
- अलखनंदा को छत्तीसगढ़ की गंगा कहा जाता है, स्थानीय स्तर पर गंगाजल के रूप में होता है पूजा में उपयोग
कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों ने कर्मकांड के विकल्प भी उपलब्ध करा दिए हैं। परिजनों की मौत पर जो लोग वाराणसी या प्रयागराज नहीं जा पा रहे, वे अलखनंदा पहुंचकर कर्मकांड कर रहे हैं। लॉकडाउन के बाद से अस्थियों के विसर्जन के लिए यहां बलरामपुर, सरगुजा और जशपुर सहित अन्य इलाकों से लोग पहुंच रहे हैं। अलखनंदा को छत्तीसगढ़ की गंगा माना जाता है। इसका भी पानी गंगाजल की तरह कभी खराब नहीं होता है।

अलखनंदा जलप्रपात में बहने वाले पानी के गुण गंगाजल के समान हैं। इसके पानी का उपयोग क्षेत्र में कई साल पहले से ही गंगाजल के रूप में करते आ रहे हैं। लोग यहां से जल भरकर भी ले जाते हैं और पूजापाठ में गंगाजल के रूप में इसका उपयोग करते हैं। अस्थि विसर्जन के लिए यहां अलग से घाट बने हुए हैं। संत गहिरा गुरु आश्रम के श्रमदानी राजू कुमार बताते हैं कि प्रतिदिन 6 से 8 परिवार यहां अस्थियां विसर्जित करने पहुंच रहे हैं।
ब्राह्मण परिवार के लोग भी यहीं कर रहे कर्मकांड
जशपुर या सरगुजा से वाराणसी या प्रयागराज जाने के लिए बिहार से होकर गुजरना पड़ता है। वहां दूसरे राज्यों से प्रवेश के लिए नियम सख्त है। ऐसे में जिले में बहने वाली अलखनंदा में जाकर कर्मकांड करने की शुरुआत शहर में ब्राह्मण परिवारों ने की। शहर के सन्ना रोड स्थित प्रवीण कुमार पाठक के माता का निधन होने पर उनकी अस्थियों का विसर्जन अलखनंदा में किया। तेलीटोली निवासी मंगल पांडेय ने भी पिता की अस्थियां प्रवाहित की।

यहां के पानी में है बैक्टीरियोफेज
जिस तरह गंगा नदी के पानी में बैक्टीरियोफेज जीवाणु है, उसी तरह अलखनंदा के पानी में भी पाया गया है। कुछ साल पहले वैज्ञानिक शोधकर्ताओं ने इसका परीक्षण कर इसकी पुष्टि भी की है। तब से अलखनंदा को छत्तीसगढ़ की गंगा के नाम से भी जाना जाता है। अलखनंदा जशपुर जिले के बगीचा विकासखंड से 28 किलोमीटर की दूरी पर प्रसिद्ध शिवालय कैलाश नाथेश्वर गुफा में बहती है। यह संत गहिरा गुरू की तपोस्थली है।









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