किसानों को लौटना पड़ेगा पारंपरिक किस्मों की ओर
शिवनाथ यादव ने नईदुनिया से चर्चा में कहा कि पहले क्षेत्र के किसान धान की अलग-अलग किस्म की खेती भूमि के अनुसार करते थे, गोबर की खाद तथा कीटों के प्राकृतिक उपचार से पर्यावरणीय सामंजस्य बरकरार रहता था। आज अधिक उत्पादन के लालच में किसान हाईब्रिड बीजों की खेती कर रासायनिक खाद व दवाओं का उपयोग कर रहे हैं। इसका पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। वहीं देश-विदेश का एक खास तबका ब्लैक राइस, रेड राइस के साथ ही पोषकता प्रदान करने वाली देसी प्रजातियों की मांग कर रहा है। इसससे बस्तर में जैविक खेती की संभावनाएं बढ़ेगी।
पौष्टिकता के साथ औषधीय गुण
शिवनाथ ने बताया कि देसी धान में कई ऐसी किस्में है जो पौष्टिकता से भरपूर हैं। जैसे काटा मैहर धान में प्राकृतिक रूप से आयरन पाए जाने की बात हमारे बुजुर्ग कहते थे। स्थानी परंपरागत ज्ञान के आधार पर इलायची आलचा जैसी धान की किस्में दवाई के रूप में भी उपयोग होती हैं। देसी सुगंधित किस्मों में पतला में बादशाहभोग, लोकटी माछी, मोटा में दांदर धान, कुमडा फूल, कुकड़ी मुंही, अलसागार, बासमुही, अर्ली वैरायटी में सुगंधित भूरसी धान, लालू 14, धंगढ़ी काजर और भी सुगंधित किस्में हैं।









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